Monday, 6 December 2021

गीत(सच है अपनी प्रीति मगर हम झूठे हैं)








टूटा है संबन्ध वचन भी टूटे हैं ।

सच है अपनी प्रीति मगर हम झूटे हैं ।


काश ! तुम्हारा मंगल हम पर,

भारी अगर नहीं पड़ता ।

हमें पृथक करने की हठ पर,

वो हर बार नहीं अड़ता ।

स्यात ! अहित फिर कभी न होता,

हम - तुम साथ रहे होते ।

और विरह की पीड़ा सह कर,

बेसुध नयन नहीं रोते ।

किन्तु भाग्य ने दृग के सब सुख लूटे हैं ।

सच है अपनी प्रीति .........


लग्न कुंडली के ग्रह गोचर,

यदि अनुकूल रहे होते ।

अपना जीवन सुखमय होता,

हम फल-फूल रहे होते ।

प्राण ! हमारे हृदय भाव में,

काश ! एकरसता होती ।

हमें एक दूजे के मन की ,

हर इक बात पता होती ।

ऐसे सपनें नयन - कोर से फूटे हैं ।

सच है अपनी प्रीति .........


ईश्वर के वर - सी होतीं तुम,

काश ! कि कृष्णा -सी होतीं ।

सच कहते हैं मन मरुथल की,

तुम मृगतृष्णा - सी होतीं ।

तुम्हें देखना भ्रम - सा होता,

भ्रम में पर, दिख जातीं तुम ।

आभासों में प्राण फूँकती,

सुधियों में मुस्कातीं तुम ।

बिना तुम्हारे, यों हम जग से छूटे हैं ।

सच है अपनी प्रीति .........


प्रशांत मिश्रा मन

गीत(सच है अपनी प्रीति मगर हम झूठे हैं)

टूटा है संबन्ध वचन भी टूटे हैं । सच है अपनी प्रीति मगर हम झूटे हैं । काश ! तुम्हारा मंगल हम पर, भारी अगर नहीं पड़ता । हमें पृथक करने की हठ पर...