टूटा है संबन्ध वचन भी टूटे हैं ।
सच है अपनी प्रीति मगर हम झूटे हैं ।
काश ! तुम्हारा मंगल हम पर,
भारी अगर नहीं पड़ता ।
हमें पृथक करने की हठ पर,
वो हर बार नहीं अड़ता ।
स्यात ! अहित फिर कभी न होता,
हम - तुम साथ रहे होते ।
और विरह की पीड़ा सह कर,
बेसुध नयन नहीं रोते ।
किन्तु भाग्य ने दृग के सब सुख लूटे हैं ।
सच है अपनी प्रीति .........
लग्न कुंडली के ग्रह गोचर,
यदि अनुकूल रहे होते ।
अपना जीवन सुखमय होता,
हम फल-फूल रहे होते ।
प्राण ! हमारे हृदय भाव में,
काश ! एकरसता होती ।
हमें एक दूजे के मन की ,
हर इक बात पता होती ।
ऐसे सपनें नयन - कोर से फूटे हैं ।
सच है अपनी प्रीति .........
ईश्वर के वर - सी होतीं तुम,
काश ! कि कृष्णा -सी होतीं ।
सच कहते हैं मन मरुथल की,
तुम मृगतृष्णा - सी होतीं ।
तुम्हें देखना भ्रम - सा होता,
भ्रम में पर, दिख जातीं तुम ।
आभासों में प्राण फूँकती,
सुधियों में मुस्कातीं तुम ।
बिना तुम्हारे, यों हम जग से छूटे हैं ।
सच है अपनी प्रीति .........
प्रशांत मिश्रा मन
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